माँ की ईश्वर से मुलाकात हुई या नहीं
कहना मुश्किल है
पर वह जताती थी जैसे
ईश्वर से उसकी बातचीत होती रहती है
और उससे प्राप्त सलाहों के अनुसार
जिंदगी जीने और दुख बर्दाश्त करने
के रास्ते खोज लेती है
भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि चंद्रकांत देवताले जी के द्वारा रचित कविता यमराज की दिशा से उद्धृत हैं | इन पंक्तियों में कवि देवताले जी की माँ का ईश्वर के प्रति पूर्ण विश्वास का भाव उत्पन्न हुआ है | कवि कहते हैं कि उनकी माँ का ईश्वर से भेंट हुआ है कि नहीं , वह नहीं जानते | परन्तु , उनकी माँ के व्यवहारों से पता चलता था कि वह ईश्वर से बात चीत करती रहती थी | ईश्वर से जो सलाह मिलता था , उन सलाहों के अनुसार , वह जिंदगी जीने और दुःख बर्दाश्त का समाधान तलाश लेती थीं |
माँ ने एक बार मुझसे कहा था-
दक्षिण की तरफ पैर करके मत सोना
वह मृत्यु की दिशा है
और यमराज को क्रुद्ध करना
बुद्धिमानी की बात नहीं
भावार्थ :- जब कवि बच्चे थे, तब उनकी माँ ने उन्हें बहुत सारी शिक्षाऐं दी थी। उन शिक्षाओं में से एक यह भी थी कि दक्षिण दिशा की ओर पैर करके कभी नहीं सोना चाहिए। दक्षिण दिशा में यमराज (मृत्यु के देवता) का निवास होता है। अगर हम दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोएंगे, तो यमराज को गुस्सा आ जाएगा। इसलिए हमारा इस दिशा में पैर करके ना सोना ही चतुराई है, क्योंकि मृत्यु के देवता, यमराज को गुस्सा दिलाना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है।
तब मैं छोटा था
और मैंने यमराज के घर का पता पूछा था
उसने बताया था-
तुम जहाँ भी हो वहाँ से हमेशा दक्षिण में
भावार्थ :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने बच्चों के कोमल मन में उठने वाले सवालों का वर्णन किया है। किस प्रकार एक बच्चा अपनी माँ के समझाने के बाद उससे यमराज के घर का पता पूछने लगता है। माँ की कुशलता का तो कोई जवाब ही नहीं है। उसे पता है कि बच्चे को किस तरह समझाना है। वह अपने बच्चे को बोल देती है कि तुम जहाँ पर भी रहो, उस जगह से दक्षिण दिशा की तरफ हमेशा यमराज का वास होगा। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने दक्षिण दिशा के द्वारा दक्षिणपंथी विचारधारा को यमराज बताया है क्योंकि जो भी इसके चंगुल में आता है, वह अपनी सभ्यता-संस्कृति का नाश कर बैठता है, इस तरह उसका सर्वनाश हो जाता है।
माँ की समझाइश के बाद
दक्षिण दिशा में पैर करके मैं कभी नहीं सोया
और इससे इतना फायदा जरूर हुआ
दक्षिण दिशा पहचानने में
मुझे कभी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ा
भावार्थ :- इन पंक्तियों में कवि ने कहा है कि माँ के बार-बार समझाने से लेखक कभी भी दक्षिण दिशा में पैर करके नहीं सोया और इस चीज का एक अच्छा प्रभाव यह पड़ा कि लेखक को दक्षिण दिशा पहचानने में कभी भी परेशानी नहीं हुई। इसका अर्थ यह है कि बड़े होने के बाद जब लेखक को अपनी माँ की दी हुई सीख समझ आयी, तो उन्हें दक्षिण दिशा का तात्पर्य समझ आया और अपनी माँ की दी हुई सीख पर अमल करते हुए, उन्होंने कभी भी दक्षिणपंथी विचारधारा को नहीं अपनाया। इससे उन्हें यह फायदा हुआ कि दूर रहकर उन्हें उनकी त्रुटियों का आभास हो गया।