फैली खेतों में दूर तलक
मखमल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिससे रवि की किरणें
चाँदी की सी उजली जाली!
तिनकों के हरे हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक,
श्यामल भू तल पर झुका हुआ
नभ का चिर निर्मल नील फलक!
भावार्थ – कवि खेतों में फैली हरियाली को देखकर कहते हैं कि जहां तक नजर जाती है वहां तक खेतों में मखमल के जैसी हरियाली ही हरियाली दिखाई दे रही हैं और उस हरियाली के ऊपर जब सूरज की किरणें पड़ती है तो ऐसा लगता है मानो उससे कोई चांदी की जाली लिपट गई हो या उसके ऊपर कोई चांदी की जाली बिछा रखी हो।
और नये-नये उगे हरे-हरे घास के तिनकों व पत्तियों के ऊपर पड़ी ओस की बूदों तो ऐसी प्रतीत होती हैं मानो जैसे हरा रुधिर यानी खून उनमें बह रहा हो। यहां पर घास के हरे तिनकों का मानवीकरण किया गया है।
पूरी प्रकृति को निहारने पर कवि को ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि धरती के सांवलेपन को सदा आकाश में छाई रहने वाली निर्मल स्वच्छ नीलिमा ने ढक रखा हो। यानि हरी भरी धरती के ऊपर फैला नीला आकाश ऐसा प्रतीत हो रहा हैं मानो जैसे उसने धरती के ऊपर अपना आँचल फैला रखा हो।
रोमांचित सी लगती वसुधा
आई जौ गेहूँ में बाली,
अरहर सनई की सोने की
किंकिणियाँ हैं शोभाशाली !
उड़ती भीनी तैलाक्त गंध
फूली सरसों पीली पीली ,
लो , हरित धरा से झाँक रही
नीलम की कलि , तीसी नीली !
भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि ‘ सुमित्रानंदन पंत ‘ जी के द्वारा रचित कविता ‘ ग्राम श्री से ली गई हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि पंत जी खेतों में उग आई फसलों का गुणगान करते हुए कहते हैं कि जब से जौ और गेहूँ में बालियाँ आ गई हैं , तब से धरती और भी रोमांचित लगने लगी है | अरहर और सनई की फसलें सोने जैसा प्रतीत हो रही हैं तथा धरती को शोभा प्रदान कर रही हैं | हवा के सहारे हिल- हिलकर मनोहर ध्वनि उत्पन्न कर रही हैं | सरसों की फसलें खेतों में लहलहा रहे हैं , जिसके फूलों के खिलने से पूरा वातावरण सुगंधित हो गया है | वहीं हरियाली युक्त धरा से नीलम की कलियाँ और तीसी के नीले फूल भी झाँकते हुए धरती को शोभा और सौंदर्य से भर रहे हैं ।
रंग रंग के फूलों में रिलमिल
हंस रही सखियाँ मटर खड़ी ,
मखमली पेटियों सी लटकीं
छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी !
फिरती है रंग रंग की तितली
रंग रंग के फूलों पर सुंदर ,
फूले फिरते ही फूल स्वयं
उड़ उड़ वृंतों से वृंतों पर !
भावार्थ – भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि सुमित्रानंदन पंत जी के द्वारा रचित कविता ग्राम श्री से ली गई हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि खेतों में विभिन्न रंगों से सुसज्जित फूलों और तितलियों की सुंदरता का मनभावन चित्रण करते हुए कहते हैं कि रंग – बिरंगे फूलों के बीच में मटर के फसलों का सुन्दर दृश्य देखकर आस – पास के सखियाँ रूपी पौधे या फसलें मुस्कुरा रहें हैं | वहीं पर कहीं मखमली पेटियों के समान छिमियों का अस्तित्व का नज़ारा भी है , जो बीज से लदी हुई हैं | तरह – तरह के रंगों से सुसज्जित तितलियाँ , तरह – तरह के रंग – बिरंगे फूलों पर उड़ – उड़कर बैठती हैं | मानो ऐसा लग रहा है , जैसे ख़ुद फूल ही उड़ उड़कर विचरण कर रहे हैं |
अब रजत स्वर्ण मंजरियों से
लद गई आम्र तरु की डाली,
झर रहे ढ़ाक , पीपल के दल ,
हो उठी कोकिला मतवाली !
महके कटहल, मुकुलित जामुन ,
जंगल में झरबेरी झूली ,
फूले आड़ू , नीम्बू , दाड़िम
आलू , गोभी , बैगन , मूली !
भावार्थ –वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही आम , लीची आदि के पौंधों में बौर आने लगती है और आडू , खुमानी आदि के पेड़ों में रंग बिरंगी फूल खिलने लगते हैं जो प्रकृति के सौंदर्य में चार चांद लगाते हैं।
उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि आम के पेड़ की डाली -डाली सफेद व पीले रंग के बौरों (मंजरियों) से लद गई हैं। पलाश (ढ़ाक) के फूल व पीपल के पत्ते गिरने लगे हैं। यह सब देख कर कोयल भी मस्त होकर गा रही हैं।
कटहल महक रहा हैं और उसकी भीनी भीनी खशबू हवा में फैल रही हैं। मगर जामुन अभी अधखिला ही हैं। और जंगल में बेर की झड़ियों में बेर झूलने लगे है। आड़ू , नीम्बू , दाड़िम में फूल आने लगे हैं। और आलू , गोभी , बैगन , मूली भी फूल रही हैं।
पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं ,
पक गये सुनहले मधुर बेर ,
अँवली से तरु की डाल जड़ी!
लहलह पालक, महमह धनिया ,
लौकी औ’ सेम फलीं , फैलीं
मखमली टमाटर हुए लाल ,
मिरचों की बड़ी हरी थैली !
उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि अमरुद पककर पीले व मीठे हो चुके हैं जिनमें लाल-लाल चित्तियाँ (धब्बे) पड़ चुकी हैं। बेर भी पककर सुनहरे व मीठे हो चुके हैं और आंवले के पेड़ में पास लगे छोटे – छोटे आंवले के दाने ऐसे प्रतीत हो रहे मानो जैसे किसी आभूषण में नग जड़ दिए हो।
पालक लहलहा रहा है तो धनिया पूरे वातावरण में खुशबू बिखेर रही है। लौकी और सेम की बेले हर रोज फैलती ही (बढ़ती ही ) जा रही हैं। और टमाटर भी पककर एकदम मखमल जैसे लाल हो गए हैं और मिर्च के पौधों पर लगी हरी-हरी मिर्च तो ऐसी लग रही है मानो किसी ने हरे-हरे थैले पौधों पर लटका दिया हों।
बालू के साँपों से अंकित
गंगा की सतरंगी रेती
सुंदर लगती सरपत छाई
तट पर तरबूजों की खेती ;
अँगुली की कंघी से बगुले
कलँगी सँवारते हैं कोई ,
तिरते जल में सुरखाब , पुलिन पर
मगरौठी रहती सोई !
भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि सुमित्रानंदन पंत जी के द्वारा रचित कविता ग्राम श्री से ली गई हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि आगे गंगा – तट के प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण करते हुए कहते हैं कि गंगा किनारे जो विभिन्न रंगों में सन्निहित रेत का भंडार है , उस रेत के टेढ़े – मेढ़े दृश्य को देखकर ऐसा लगता है , मानो कोई बालु रूपी साँप पड़ा हुआ है | गंगा के तट पर जो घास की हरियाली बिछी है , वह बहुत सुन्दर लग रही है | साथ में तरबूजों की खेती से तट का दृश्य बेहद सुन्दर और आकर्षक लग रहा है | बगुले तट पर शिकार करते हुए अपने पंजों से कलँगी को ऐसे सँवारते या ठीक करते हैं , मानो वे कंघी कर रहे हैं | गंगा के जल में चक्रवाक पक्षी तैरते हुए नज़र आ रहे हैं और जो मगरौठी पक्षी हैं , वह आराम से सोए हुए विश्राम कर रहे हैं ।
हँसमुख हरियाली हिम-आतप
सुख से अलसाए-से सोये ,
भीगी अँधियाली में निशि की
तारक स्वप्नों में-से खोये-
मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम-
जिस पर नीलम नभ आच्छादन-
निरुपम हिमांत में स्निग्ध शांत
निज शोभा से हरता जन मन !
भावार्थ – उपरोक्त पंक्तियों में कवि अपने गांव के हरे भरे सौंदर्य को देख रहे है। जो उन्हें बहुत सुंदर दिखाई दे रहा है। कवि कहते हैं प्रकृति अपनी इस अकूत सम्पदा (फसल , रंग बिरंगे फूल , हरे भरे पेड़ पौधे , प्रकृति की अकूत सम्पदा है ) से बेहद खुश हैं।
और इन सर्दियों की धूप (हिम-आतप) में तो हरियाली (प्रकृति) सुख से कभी अलसाई (आलस्य से भरी हुई) हुई तो , कभी सोई दिख रही रही हैं और इस हरियाली के ऊपर पडी ओस की बूँदें , उन तारों की भांति दिखाई दे रही हैं जो अपने सपनों में खोये हुए हैं।
इस हरे-भरे गांव की हरियाली को देख कर कवि को ऐसा लग रहा हैं मानो पन्नों (हरे रंग का रत्न) से भरा कोई डिब्बा खुल गया हो , जिसको नीलम की सी आभा देने वाले नीले रंग का आकाश ढके हुए हो। यानि पन्नों से भरे उस डिब्बे को नीले आसमान ने ढक रखा हो।
सर्दियों के अंत (हिमांत) में इस गाँव के चारों तरफ लहलहाती फसल , हरियाली व गांव की शांति सभी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती हैं।